इन ग्रंथों के लेखक

महन्त डॉ. योगी विलासनाथ जी

नाथ संप्रदाय के योगी, चित्रकार और इन दसों ग्रंथों के लेखक। भौतिकी की पढ़ाई और कारख़ाने की नौकरी से होते हुए, सज्जनगड के जंगल और अस्थल बोहर के कान-चिरा तक, और वहाँ से हरिद्वार के गुरु गोरक्षनाथ मन्दिर में बीस वर्ष की सेवा तक।


एक नज़र में

जन्म
1957 · नासिक, महाराष्ट्र
माता-पिता
श्री शंकरराव कपिले (सब-इन्स्पेक्टर, नासिक) और सौ. वत्सला देवी
गुरु
महामन्त्री योगी आनन्दनाथ जी — योगी महासभा, हरिद्वार
शिक्षा
बी.एस-सी. (भौतिकी), 1979
चिरा गुरु
श्री योगी हजारीनाथ जी — मठ अस्थल बोहर, रोहतक
सेवा
गुरु गोरक्षनाथ मन्दिर, अपर रोड, हरिद्वार — 20 वर्ष

घर से शुरुआत — 1957 से 1979

जन्म 1957 में नासिक, महाराष्ट्र में हुआ। पिता श्री शंकरराव कपिले नासिक में सब-इन्स्पेक्टर थे, माता सौ. वत्सला देवी।

1961 में माता-पिता का सम्पर्क श्री बाबाजी आनन्दनाथ जी से हुआ और उन्हें मन्त्र-अनुग्रह प्राप्त हुआ। बचपन माता के साथ गंगा-स्नान और चातुर्मास की उपासना में बीता, और छुट्टियों में माता-पिता के साथ सद्गुरु जी की सेवा में जाना होता रहा।

शिक्षा विज्ञान की रही: 1979 में बी.एस-सी. (भौतिकी)। उनके ग्रंथों में साधना को बार-बार वैज्ञानिक दृष्टि से देखने की जो आदत दिखती है, उसकी जड़ यहीं है।

नौकरी और तपस्या, साथ-साथ — 1981 से 1991

1981 से 1984 तक फार्मा सिंथी केमिकल फैक्टरी में सुपरवाइजर, और 1984 से 1991 तक एफ.एफ.सी. लिमिटेड में शिफ़्ट सुपरवाइजर, फिर शिफ़्ट इंचार्ज।

यही दस वर्ष उनकी सबसे कठिन साधना के भी हैं। 1983 में सज्जनगड (जिला सातारा) के जंगल में — समर्थ रामदास स्वामी की तपोभूमि — एक समय का भोजन और एक वस्त्र पर, गुफा में रहकर अखण्ड पाठ और पूजन।

उसी वर्ष रामझळ और चाफळ (जि. सातारा) के घने जंगल में साधना, जहाँ भोजन गूलर के फल और जंगली कंद-मूल थे। वे लिखते हैं कि वहाँ वनस्पतियाँ स्वयं अपने गुण-धर्म और उपयोगिता बताती थीं।

आगे मार्कण्डेय पर्वत की गुफा में सात दिन का हठयोग अनुष्ठान, अंजनेरी पर्वत पर सावन में पवनाहारी साधना, सप्तशृंगी, तुळजापुर और कोल्हापुर के शक्तिपीठों पर नवरात्रि की विशेष साधना, और त्र्यंबक के ब्रह्मगिरी पर्वत पर शिवजटा का साक्षात्कार। इन्हीं अनुभूतियों के बाद संसार से विरक्त होने का निर्णय हुआ।

गालना — जहाँ चित्रकार और योगी एक हुए

1985–86 में वे गुरुदेव योगी आनन्दनाथ जी की तपोभूमि, गाँव गालना (जि. नासिक) गुरु-दर्शन के लिए गए। वहाँ एक दीवार पर नौ नाथों के चित्र अधूरे पड़े थे — कोई चित्रकार बीच में छोड़ गया था।

वे स्वयं चित्रकार थे, इसलिए गुरुजी ने वह चित्र पूरा करने की आज्ञा दी। फिर नवनाथ, नवदुर्गा, बारह ज्योतिर्लिंग और अष्टविनायक — सब दीवार-चित्र बनाते हुए छह-सात महीने वहीं रहे, और उसी काल में गुरुजी का सान्निध्य मिला।

त्याग और कान-चिरा

घर-बार, माता-पिता, रिश्ते-नाते और सुख-सम्पत्ति छोड़ना कठिन प्रसंग था, पर वे लिखते हैं कि गुरुकृपा से सब सहज हो गया। गालना गुरुस्थान पर यथाविधि दीक्षा और शिक्षा हुई।

त्र्यंबक से कदली (कर्नाटक) तक पैदल जाने वाली पात्रदेव यात्रा — नाथ सिद्धों की झुंडी — जब पारुण्डा (जि. पुणे) पहुँची, तब वहीं उनका त्याग-वैराग चुकाया गया और भण्डारा हुआ।

उसके बाद गुरुदेव उन्हें सीधे मठ अस्थल बोहर (रोहतक) ले गए, जहाँ कान-चिरा विधि सम्पन्न हुई — साथ में गोरखपुर के योगेश्वर विरनाथ का भी। वहीं वे पूर्ण रूप से नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी बने। चिरा गुरु रहे मठ के मुख्य पुजारी श्री योगी हजारीनाथ जी, और मार्गदर्शन मिला मठाधीश महन्त चान्दनाथ जी का।

ग्रंथ कैसे बने

अस्थल बोहर में उन्होंने गुरुदेव को सभी योगासन और ध्यान-पद्धति करके दिखाई, तो उन्हें योग-कक्षा लेने को कहा गया — एक बड़े हॉल में साधु-संतों को छह मास योग सिखाते रहे। साथ ही गुरु-आज्ञा से साहित्य-लेखन शुरू हुआ।

तीन वर्ष के पूर्ण अभ्यास से «श्री नाथ रहस्य» बना — 650 पृष्ठ का ग्रंथ, जिसमें शाबर मंत्र-तंत्र, नाथ संप्रदाय के संस्कार-आचरण, ज्ञानयोग, भक्तियोग और कर्मकांड का खुला विश्लेषण है। यही ग्रंथ नाथ सम्प्रदाय की पहचान बना, और गुरुदेव ने उन्हें लेखक-साहित्यकार बना दिया।

«श्री नाथ सिद्धों की शंख ढाल» (500 पृष्ठ) उपदेशी गुरु से मिली शिक्षा और अपने अनुभव पर बना। यह विवादित विषय था — योगी महासभा के सभापति महन्त अवैद्यनाथ जी, महन्त योगी चान्दनाथ जी, गुरु योगी आनन्दनाथ जी और अन्य प्रधान उपदेशी गुरुओं ने विचार करके देखा कि शंख ढाल का गुप्त विधान लोग भूलते जा रहे हैं, और उसे लिखित तथा प्रमाणित रूप में रखने की आज्ञा दी।

मन्दिर में नौ नाथों का 20×18 फुट का तैल चित्र उन्होंने ही बनाया था, जो पूरे देश में प्रख्यात हुआ — और उसी चित्र से प्रेरणा पाकर «श्री नवनाथ चरित्र» का ग्रंथ बना।

2007 की कैलास-मानसरोवर यात्रा में ॐकार पर्वत के दर्शन हुए, और उस प्रेरणा से «श्री नाथ सिद्धों की ॐकार साधना» बना — 250 पृष्ठ, जो नाथ परम्परा के मूल सिद्धांत, मूल उद्देश्य और मूल प्रणाली को सिद्ध करता है।

हरिद्वार, और देश के बाहर

योगी महासभा के गुरु गोरक्षनाथ मन्दिर, हरिद्वार में उनकी सेवा-पूजा, ध्यान, साधना और तपस्या के बीस वर्ष बीते — वही उनकी कर्मभूमि है।

विदेश-यात्राएँ कुल दस देशों की रहीं: जुलाई 2007 में चीन — कैलाश पर्वत की सव्वा महीने की पैदल यात्रा; जनवरी 2011 में मॉस्को, जर्मनी, लाटविया (रिगा), यूक्रेन और पोलैंड; 2012 में तुमेन (रूस) का योग दिवस; नेपाल और तिब्बत में साधना तथा तीर्थ-दर्शन; और 2016 में इटली का योग दिवस।

वे लिखते हैं कि आज विदेशी भी नाथ सम्प्रदाय में आकर्षित होकर दीक्षित हो रहे हैं, और उनका उद्देश्य यही है कि जनमानस नाथ सिद्ध प्रणाली को सहज-सरल रूप में समझ सके।

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गुरुजी के प्रवचन से

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गुरुजी के प्रवचन से

मरो रे जोगी मरो, मरण है मीठा। इस मरनी मरो, जिस मरनी गोरख मरि दीठा।

गोरखबानी — परंपरा का दोहा

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